देवदासी
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Source summary
Wikipediaये ‘देवदासी’ प्राचीन प्रथा है। भारत के कुछ क्षेत्रों में खास कर दक्षिण भारत में महिलाओं को धर्म और आस्था के नाम पर वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेला गया। जबकि धर्म से इसका कोई संबंध नहीं है । सामाजिक-पारिवारिक दबाव के चलते ये महिलाएं इस धार्मिक कुरीति का हिस्सा बनने को मजबूर हुई। देवदासी प्रथा के अंतर्गत कोई भी महिला धार्मिक स्थल में खुद को समर्पित करके देवताओं की सेवा करती थीं। देवताओ को खुश करने के लिए मंदिरों में नाचती थीं। इस प्रथा में शामिल महिलाओं के साथ धर्म स्थल के पुजारियों ने यह कहकर शारीरिक संबंध बनाने शुरू कर दिए कि इससे उनके और भगवान के बीच संपर्क स्थापित होता है। धीरे-धीरे यह उनका अधिकार बन गया, जिसको सामाजिक स्वीकायर्ता भी मिल गई। उसके बाद राजाओं ने अपने महलों में देवदासियां रखने का चलन शुरू किया। राजाओं ने महसूस किया कि इतनी संख्या में देवदासियों का पालन-पोषण करना उनके वश में नहीं है, तो देवदासियां सार्वजनिक संपत्ति बन गई।, कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में यह प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। देवदासी प्रथा को लेकर कई गैर-सरकारी संगठन अपना विरोध दर्ज कराते रहे। सामान्य सामाजिक अवधारणा में देवदासी ऐसी स्त्रियों को कहते हैं, जिनका विवाह मंदिर या अन्य किसी धार्मिक प्रतिष्ठान से कर दिया जाता है। उनका काम मंदिरों की देखभाल तथा नृत्य तथा संगीत सीखना होता है। पहले समाज में इनका उच्च स्थान प्राप्त होता था,वे समाज में पूजनीय होती थीं बाद में हालात बदतर हो गये। इन्हें मनोरंजन की एक वस्तु समझा जाने लगा। देवदासियां परंपरागत रूप से वे ब्रह्मचारी होती हैं, पर अब उन्हे पुरुषों से संभोग का अधिकार भी रहता है। यह एक अनुचित और गलत सामाजिक प्रथा है। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था। बीसवीं सदी में देवदासियों की स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। अँगरेज़ ने तथा समाज सुधारकों ने देवदासी प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की तो लोगों ने इसका विरोध किया। इसलिए शायद आर्य भूमि भारत में हुए अनेक विद्वान एवं बुद्धिजीवी जातिवाद के कट्टर विरोधी रहे है जिनमे स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय ,डॉ आंबेडकर जैसे महान समाजवादी भी शामिल हैं। भारत को अपने इतिहास से बहुत कुछ सिखने की जरूरत है। लेकिन इसमें दी गई जानकारी से आप असहमत हो सकते है है क्योंकि उपरोक्त दी गई सूचनाओं क
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