हज़रत निज़ामुद्दीन
भारतीय सूफी संत, अमीर खुसरो के आध्यात्मिक मार्गदर्शक(1236-1325)
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Source summary
Wikipediaहजरत निज़ामुद्दीन (حضرت خواجة نظام الدّین اولیا) (1325-1236) चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल पेश की, कहा जाता है इस प्रकार ये सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय बन गए। हजरत साहब ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्यागे और उसी वर्ष उनके मकबरे का निर्माण आरंभ हो गया, किंतु इसका नवीनीकरण 1562 तक होता रहा। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है।
निज़ामुद्दीन औलिया ने, अपने पूर्ववर्तियों की तरह, ईश्वर को महसूस करने के साधन के रूप में प्रेम पर जोर दिया। उनके लिए ईश्वर के प्रति प्रेम का अर्थ मानवता के प्रति प्रेम था। दुनिया के बारे में उनका दृष्टिकोण धार्मिक बहुलवाद और दयालुता की अत्यधिक विकसित भावना से चिह्नित था। 14वीं शताब्दी के इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी का दावा है कि दिल्ली के मुसलमानों पर उनका प्रभाव इतना था कि सांसारिक मामलों के प्रति उनके दृष्टिकोण में एक आदर्श बदलाव आया। लोगों का झुकाव रहस्यवाद और प्रार्थनाओं की ओर होने लगा और वे दुनिया से अलग रहने लगे। यह भी माना जाता है कि तुग़लक़ राजवंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुग़लक़ ने निज़ामुद्दीन से बातचीत की थी। प्रारंभ में, वे अच्छे संबंध साझा करते थे लेकिन जल्द ही इसमें कड़वाहट आ गई और ग़ियास-उद-दीन तुगलक और निज़ामुद्दीन औलिया के बीच मतभेद के कारण संबंध कभी नहीं सुधरे और उनकी दुश्मनी के कारण उस युग के दौरान उनके बीच नियमित झगड़े होते रहे।[उद्धरण चाहिए]
हज़रत ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म १२३८ में उत्तरप्रदेश के बदायूँ जिले में हुआ था। ये पाँच वर्ष की उम्र में अपने पिता, अहमद बदायनी, की मॄत्यु के बाद अपनी माता, बीबी ज़ुलेखा के साथ दिल्ली में आए। इनकी जीवनी का उल्लेख आइन-ए-अकबरी, एक १६वीं शताब्दी के लिखित प्रमाण में अंकित है, जो कि मुगल सम्राट अकबर के एक नवरत्न मंत्री ने लिखा था.
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